❤️श्री राधा मदनमोहन❤️

 
❤️श्री राधा मदनमोहन❤️
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बृषभानु-नंदिनी अति सुछबि मयी बनी। बंदाबन-चंद राधा निरमल चाँदनी ।। स्याम अलकनि सुबीच मोती दुति मंगा। मानहँ झलमलति संभु के सीस गंगा ॥ स्रवन ताटंक सोहै चिकुरनि की काँति । उलटि चल्यौ है राहु चक्र की सु भाँति ।। गोरै ललाट सोहै सदुर को बिंद । ससिहि उपमा देइ को कबि को है निंद ।। आलस उनीदे नैन, लागत सुहाए । नासिका चंपक कली को अली भाए ॥ बदन-मंजन ते अँजन गयौ 8 दुरि । कलँक रहित ससि पून्यौ ज्यौं कला पूरि । गिरि तें लता है भई यह तो हम सुनि । कंचन लता ते भए द्वै गिरि बर पुनि ।। कंचन से तनु सोहै नीलांबर सारी। कुहूँ-निसा-मध्य मनौ दामिनी उज्यारी ॥ नख सिख सोभा मोपै बरनी नहिं जाइ । तुम सी तुमही राधा स्यामहिं मन-भाइ । यह छबि सूरदास मन नित रहै बानी । नद के नँदन राजा राधिका रानी ॥
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shwetashweta
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